धरती पर कुछ स्थान केवल भौगोलिक क्षेत्र नहीं होते, बल्कि वे आस्था, भक्ति और शाश्वत महाकाव्यों के जीवंत प्रमाण होते हैं। विंध्य पर्वतमाला की गोद में बसा 'चित्रकूट' एक ऐसा ही दिव्य और अलौकिक धाम है। महान हिंदू महाकाव्य रामायण के अनुसार, यह वही पवित्र वन है जहाँ मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम, माता सीता और उनके परम भक्त भाई लक्ष्मण ने अपने चौदह वर्ष के वनवास के पूरे ग्यारह वर्ष व्यतीत किए थे। जब आप चित्रकूट की धरती पर कदम रखते हैं, तो आप केवल एक पर्यटक नहीं होते; आप उस परमात्मा के दिव्य पदचिह्नों पर चलने वाले एक तीर्थयात्री बन जाते हैं।
चित्रकूट की जीवनरेखा यहाँ की पवित्र मंदाकिनी नदी है। इसकी शांत लहरें मानो आज भी प्रेम, त्याग और तपस्या की प्राचीन कथाएँ सुनाती हैं। अलौकिक भोर के समय रामघाट पर पवित्र डुबकी लगाना, जब हवा में मंदिर की घंटियों की गूंज और धूप-अगरबत्ती की महक तैर रही हो, एक ऐसा अनुभव है जो आपकी आत्मा को शुद्ध कर देता है। मंदाकिनी के तट पर होने वाली संध्या आरती एक ऐसा मनमोहक दृश्य है जो आपको सीधे ईश्वरीय चेतना से जोड़ देता है।
चित्रकूट तीर्थयात्रा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा कामदगिरि पर्वत की परिक्रमा है। ऐसा माना जाता है कि कामदगिरि पर्वत ही वह मूल स्थान है जहाँ भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण ने अपना निवास स्थान बनाया था। लाखों श्रद्धालु इस पर्वत के चारों ओर 5 किलोमीटर की परिक्रमा नंगे पैर करते हैं। यह मान्यता है कि सच्चे मन से परिक्रमा करते हुए प्रार्थना करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और मन को असीम शांति मिलती है।
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