हरिद्वार गंगा मैया की तीव्र धाराओं, भव्य मंदिरों और शांत आश्रमों की भूमि है। हर की पौरी पर सूर्यास्त के समय होने वाली महाआरती और गंगा में बहते अनगिनत दीयों की छवि आँखों में समा जाती है।

किसने बनवाया / इतिहास

हरिद्वार (यानी ईश्वर तक जाने का मार्ग) वह पवित्र स्थल है जहाँ मोक्षदायिनी गंगा नदी पहाड़ों से उतरकर मैदानी भागों में आती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, देव-असुर समुद्र मंथन के दौरान अमृत कलश की बूंदें यहाँ गिरी थीं, इसलिए यहाँ हर १२ वर्ष में महाकुंभ लगता है।

वर्तमान धार्मिक मान्यता व महत्व

हर की पौरी पर स्थित 'ब्रह्मकुंड' को अत्यंत पवित्र माना गया है। मान्यता है कि यहाँ स्नान करने से पूर्वजों को सद्गति मिलती है और मनुष्य सभी जन्मों के कर्म-बंधनों से मुक्त हो जाता है। यहाँ पितृ तर्पण करने की भी विशेष मान्यता है।

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हर की पौरी

हरिद्वार का हृदय स्थल, जहाँ पवित्र ब्रह्मकुंड और विश्व-प्रसिद्ध गंगा आरती है।

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मनसा देवी मंदिर

बिल्व पर्वत पर स्थित देवी मनसा का मंदिर, जहाँ उड़नखटोले (रोपवे) से जाया जाता है।

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चंडी देवी मंदिर

नील पर्वत की चोटी पर स्थित प्रसिद्ध सिद्धपीठ मंदिर।

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दक्ष प्रजापति मंदिर

कनखल में स्थित प्राचीन मंदिर, जिसे माता सती के पिता राजा दक्ष का निवास स्थान माना जाता है।

सुबह 06:00 बजे

हर की पौरी पवित्र स्नान

सुबह ब्रह्मकुंड के शीतल और औषधीय गुणों वाले गंगाजल में स्नान कर नए दिन की शुरुआत करें।

सुबह 08:30 बजे

मनसा देवी रोपवे यात्रा

रोपवे में बैठकर बिल्व पर्वत पर जाएं और मनसा देवी के दर्शन कर मन्नत का धागा बांधें।

सुबह 11:30 बजे

चंडी देवी व अंजनी देवी

नील पर्वत पर चंडी देवी के दर्शन करें और हनुमान जी की माता अंजनी देवी के दर्शन का लाभ उठाएं।

दोपहर 02:00 बजे

कनखल शिव मंदिर दर्शन

हरिद्वार के दक्षिण में स्थित कनखल जाकर राजा दक्ष के यज्ञ कुंड और प्राचीन शिव मंदिर के दर्शन करें।

शाम 05:00 बजे

हर की पौरी गंगा आरती

घाट पर समय से पहुंचकर अपना स्थान लें और शंखनाद व जलती मशालों के बीच होने वाली दिव्य गंगा आरती के साक्षी बनें।

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