वाराणसी (काशी)
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वाराणसी (काशी)

काशी ज्ञान, अध्यात्म, योग और भारतीय संस्कृति की हृदयस्थली है। यहाँ गंगा नदी के अर्धचंद्राकार घाटों पर सुबह की ताज़ी हवा में होने वाला शंखनाद (Subah-e-Banaras) और शाम को होने वाली महा गंगा आरती भक्तों के मन को अपार शांति देती है।

किसने बनवाया / इतिहास

वाराणसी संसार के सबसे प्राचीन और जीवंत शहरों में से एक है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस पवित्र नगर को स्वयं भगवान शिव ने स्थापित किया था। वर्तमान काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण 1780 में इंदौर की महारानी देवी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा करवाया गया था, जिसके बाद महाराजा रणजीत सिंह ने मंदिर के गुंबद पर सोने की परत चढ़वाई थी।

वर्तमान धार्मिक मान्यता व महत्व

हिंदू धर्म में काशी को मोक्ष का प्रवेश द्वार माना गया है। मान्यता है कि काशी भगवान शिव के त्रिशूल की नोक पर टिकी है। यहाँ गंगा स्नान करने और बाबा विश्वनाथ के दर्शन करने से मनुष्य के सभी जन्मों के पाप कट जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि यहाँ प्राण त्यागने वाले जीव को भगवान शिव स्वयं तारक मंत्र सुनाकर जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त कर देते हैं।

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श्री काशी विश्वनाथ मंदिर

12 ज्योतिर्लिंगों में से एक अत्यंत जाग्रत और पवित्र मुख्य शिव मंदिर।

दशाश्वमेध घाट

वाराणसी का सबसे प्रसिद्ध घाट जहाँ प्रतिदिन संध्या समय महा गंगा आरती का आयोजन होता है।

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सारनाथ बौद्ध तीर्थ

वह ऐतिहासिक स्थल जहाँ भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद अपना प्रथम उपदेश दिया था।

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संकट मोचन मंदिर

गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा स्थापित भगवान हनुमान का अत्यंत चमत्कारी धाम।

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मणिकर्णिका घाट

काशी का महाश्मशान घाट, जिसे सनातन संस्कृति में शाश्वत मुक्ति का द्वार माना गया है।

सुबह 05:30 बजे

अस्सी घाट पर सुबह-ए-बनारस

सुबह की शुरुआत अस्सी घाट पर वैदिक मंत्रोच्चार, गंगा पूजन, योग और शास्त्रीय संगीत की प्रस्तुति के साथ करें।

सुबह 07:30 बजे

गंगा में नौका विहार

घाट से एक सुंदर नाव (बोट) किराए पर लें और अस्सी घाट से मणिकर्णिका घाट तक गंगा की लहरों से घाटों के इतिहास को देखें।

सुबह 09:00 बजे

काशी विश्वनाथ दर्शन व जलाभिषेक

गंगा घाट से सीधे नव्य-भव्य काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के मार्ग से गर्भगृह पहुंचकर बाबा विश्वनाथ का दर्शन करें।

दोपहर 01:00 बजे

सारनाथ दर्शन व म्यूजियम

काशी से 10 किमी दूर स्थित बौद्ध स्तूप, अशोक स्तंभ और ऐतिहासिक पुरातात्विक संग्रहालय का भ्रमण करें।

शाम 05:30 बजे

दशाश्वमेध घाट पर महा गंगा आरती

सूर्यास्त के समय दशाश्वमेध घाट पर पहुंचे और नाव या घाट पर बैठकर ढोल, नगाड़े और शंखनाद के बीच होने वाली दिव्य गंगा आरती देखें।

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