वाराणसी के दशाश्वमेध घाट पर प्रतिदिन संध्या समय होने वाली गंगा महाआरती अध्यात्म, संगीत, प्रकाश और अटूट श्रद्धा का एक अलौकिक दृश्य प्रस्तुत करती है। शंखनाद, डमरू की ध्वनि और दीपों की जगमगाहट भक्तों को मंत्रमुग्ध कर देती है।
किसने बनवाया / इतिहास
दशाश्वमेध घाट पर होने वाली गंगा आरती आधुनिक रूप में वर्ष 1992 से नियमित रूप से आयोजित की जा रही है, जिसकी शुरुआत गंगा सेवा निधि द्वारा की गई थी। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, दशाश्वमेध घाट का निर्माण स्वयं भगवान ब्रह्मा जी ने भगवान शिव के पृथ्वी आगमन पर उनके स्वागत हेतु किया था, जहाँ उन्होंने दस अश्वमेध यज्ञ किए थे। इसी कारण इस घाट और यहाँ होने वाली आरती का आध्यात्मिक महत्व अत्यधिक है।
वर्तमान धार्मिक मान्यता व महत्व
सनातन परंपरा में गंगा नदी को केवल एक जलधारा नहीं, बल्कि साक्षात पतित-पाविनी मोक्षदायिनी मैया माना जाता है। वर्तमान में मान्यता है कि संध्या काल में होने वाली इस भव्य महाआरती के दर्शन करने से जातक के तन-मन की अशुद्धियां दूर होती हैं, नकारात्मक ऊर्जा का ह्रास होता है और गंगा मैया के आशीर्वाद से जीवन सुख-समृद्धि से भर जाता है। आरती में प्रयुक्त कपूर और धूप की सुगंध वातावरण को शुद्ध करती है।
दशाश्वमेध घाट
मुख्य महाआरती का साक्षी बनने के लिए सबसे प्रसिद्ध और पौराणिक गंगा घाट।
गंगा सेवा निधि आरती मंच
वह पवित्र स्थान जहाँ कुशल अर्चक (पुजारी) पीतल के भारी दीयों से आरती संपन्न करते हैं।
गंगा नदी (नौका विहार)
शाम को नावों पर बैठकर नदी की शांत जलधारा से आरती का अद्भुत नजारा देखना।
राजेन्द्र प्रसाद घाट
दशाश्वमेध के पास स्थित घाट जहाँ से भी आरती का विहंगम दृश्य दिखाई देता है।
दशाश्वमेध घाट आगमन
आरती शुरू होने से लगभग दो घंटे पहले घाट पर पहुंचे ताकि सीढ़ियों पर बैठने की सही जगह मिल सके, क्योंकि यहाँ भक्तों की भारी भीड़ होती है।
शाम की नौका यात्रा (Boat Ride)
घाट से एक पारंपरिक नाव किराए पर लें और सूर्यास्त के समय गंगा की लहरों के बीच से बनारस के सुंदर घाटों का दर्शन करें।
आरती स्थल पर स्थान ग्रहण
नाव को आरती मंच के ठीक सामने जल में लगवायें या घाट की सीढ़ियों पर वैदिक मंत्रोच्चार सुनने के लिए स्थान ले लें।
शंखनाद व महाआरती दर्शन
आरंभ में शंखनाद, डमरू वादन और वैदिक मंगलाचरण के साथ आरती शुरू होती है। पुजारियों द्वारा विशाल पीतल के पंचमुखी दीयों को उठाने का अलौकिक दृश्य देखें।
गंगा दीपदान व महाप्रसाद
आरती संपन्न होने के बाद गंगा मैया में मिट्टी के दीयों (दीपदान) को प्रवाहित करें, माँ गंगा का आशीर्वाद लें और प्रसाद ग्रहण करें।
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